क्या हम वास्तव में आजाद है ?
७२ साल की आजादी के बाद भी हमारा देश आजाद नहीं हुआ है। लोगो की न तो बेरोज़गारी की समस्या दूर हुई है और न ही लोग आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुआ है। हर पल जीने के लिए उसे अलग कीमत चुकानी होती है। बिजली की दर दोगुनी हो गई है। पेट्रोल की कीमत मनमाने ढंग से बढ़ रहा है। लोगों का जीना दूभर हो गया है। परन्तु सरकार गरीबी हटाने की बात कहती है। गरीब वास्तव में कौन है? गरीबी का मापदंड क्या है ? एक मिडिल क्लास फैमिली की आम समस्या को कोई नहीं समझ सकता है। गरीब लोगो को लाल कार्ड उपलब्ध होने पर हर तरह की सहुलियत प्राप्त है , परन्तु मिडिल क्लास लोगो की समस्या के बारे में कोई नहीं सोचता। बैंक से लोन प्राप्त करने के लिए या तो सरकारी नौकरी होनी चाहिये , या २५००० की नौकरी होनी चाहिए। एक मिडिल क्लास फैमिली की सैलरी १०००० से १५००० या उस से भी काम होती है। क्या सरकार का ध्यान इस तरफ है। सिर्फ लंबी लंबी चुनावी वादे और बेरोजगारी की समस्या दुर करने का आश्वाशन से समस्या दूर नहीं होगी। सरकार को इस तरफ ध्यान देना होगा की एक साधारण आदमी भी आम जिंदगी जी सके।
७२ साल की आजादी के बाद भी हमारा देश आजाद नहीं हुआ है। लोगो की न तो बेरोज़गारी की समस्या दूर हुई है और न ही लोग आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुआ है। हर पल जीने के लिए उसे अलग कीमत चुकानी होती है। बिजली की दर दोगुनी हो गई है। पेट्रोल की कीमत मनमाने ढंग से बढ़ रहा है। लोगों का जीना दूभर हो गया है। परन्तु सरकार गरीबी हटाने की बात कहती है। गरीब वास्तव में कौन है? गरीबी का मापदंड क्या है ? एक मिडिल क्लास फैमिली की आम समस्या को कोई नहीं समझ सकता है। गरीब लोगो को लाल कार्ड उपलब्ध होने पर हर तरह की सहुलियत प्राप्त है , परन्तु मिडिल क्लास लोगो की समस्या के बारे में कोई नहीं सोचता। बैंक से लोन प्राप्त करने के लिए या तो सरकारी नौकरी होनी चाहिये , या २५००० की नौकरी होनी चाहिए। एक मिडिल क्लास फैमिली की सैलरी १०००० से १५००० या उस से भी काम होती है। क्या सरकार का ध्यान इस तरफ है। सिर्फ लंबी लंबी चुनावी वादे और बेरोजगारी की समस्या दुर करने का आश्वाशन से समस्या दूर नहीं होगी। सरकार को इस तरफ ध्यान देना होगा की एक साधारण आदमी भी आम जिंदगी जी सके।